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Saturday, 10 January 2015

किरण




प्रातः की वो काल विनाशी,
किरण चमत्कारी–सी।
सारे जग को दिशा दिखाती,
जगत करुण–हारी-सी॥

कल्प विकल्प बहुत मस्तक में,
कभी जरा मिलना हो।
अनुनय करूँ के हर ले सारी,
धुन्ध अन्धकारी-सी॥














धुन्ध जो जग में फ़ैल रही है,
ईष, द्वेष, कुण्ठा की।
सारे जग का नाश करे जो,
मानव संहारी-सी॥

‘भोर’ समय ओ किरण अजनबी,
छा जाओ वसुधा पर।
धुन्ध हटा, जीवंत बना दो,
धरती यह प्यारी-सी॥





किरण ‘भोर’ की अमृत भाँति,
है प्रेरित-कर्ता – सी।
मन के विकार भी दूर करे है,
पावन शुभकारी – सी॥

किरण वही, जो दुनिया भर में,
एक समान बिछी है।
हर मानव पर कंबल भाँति,
चंचल मतवारी – सी॥


© प्रभात सिंह राणा ‘भोर’

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