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Thursday, 13 August 2015

गज़ल हो तुम…

मेरा आज हो तुम, मेरा कल हो तुम,
मेरा हर इक पल हो तुम।
मेरे जज़्बातों के मेल से,
बनी कोई गज़ल हो तुम॥   

जग ने मुँह फ़ेरा, तुम तब भी साथ थी,
जब कभी तुम ना थी, तब तुम्हारी याद थी।
मेरे साथ हर वक़्त, हर पल हो तुम,
गज़ल हो तुम॥



 महक जो मुझमें है, ख़ुशबु तुम्हारी है,
जो कुछ भी साथ है, यादें तुम्हारी है।
पंखुड़ी-सी खिलती वो मुस्कान तुम्हारी,
शायद नव-निर्मित कमल हो तुम॥
गज़ल हो तुम॥

तुम जो साथ होती हो, दुनिया भूल जाता हूँ,
खुद को तुम्हारा, बस तुम्हारा ही पाता हूँ।
तुम्हारी करीबी से मन प्रफ़ुल्लित होता है,
मन में उठती हलचल हो तुम॥
गज़ल हो तुम॥



तुम्हारी वो ख्वाहिशें, याद मुझे अब भी हैं,
तुम्हारी फ़रमाइशें, याद मुझे अब भी हैं।
याद है मुझको, किस-कदर मुझे जलाती थीं,
दूसरों की बातें तुम बीच में ले आती थी,
प्यारी-सी कुछ-कुछ चंचल हो तुम॥
गज़ल हो तुम॥

नदियों-सी शीतल मुस्कान तुम्हारी,
चाँद-सा चेहरा और बातें तुम्हारी।
यादों में साथ मेरे पल-पल हो तुम,
पावन औ स्वच्छ निर्मल हो तुम॥

सच कहता हूँ-“गज़ल हो तुम।’’
गज़ल हो तुम॥





©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


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